जर्मनी के पूर्वी राज्यों में हाल के चुनाव परिणाम और फ्रांस में चल रहे चुनावी रुझान 20वीं सदी के यूरोप की याद दिलाते हैं, जब तानाशाही बढ़ रही थी और चरमपंथ अपने चरम पर था. नाज़ी जर्मनी का हिटलर द्वितीय विश्व युद्ध के केंद्र में था. फ्रांस में ज्यां जाउरेस (Jean Jaurès) जैसे युद्ध-विरोधी कार्यकर्ताओं और नेताओं की दिन-दहाड़े हत्या की जा रही थी.
इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम (Eric Hobsbawm) ने अपनी किताब ‘द एज ऑफ एक्सट्रीम्स’ (The Age of Extremes) में द्वितीय विश्व युद्ध के कारण का वर्णन सिर्फ दो शब्दों में किया था: एडॉल्फ हिटलर. यह वह समय था जब पूरी दुनिया में यहूदियों के प्रति नफरत चुपचाप, लेकिन जंगल की आग की तरह फैल गई थी. यहूदी-विरोधी यह भ्रामक धारणा कि यहूदी ईसाई बच्चों की बलि देते थे, दुनिया के कुछ हिस्सों में अब भी मानी जा सकती है.

जब हम इसकी नाज़ी जर्मनी, फासीवाद, राजनीतिक हत्याओं और हमारे आस-पास की समकालीन दुनिया के संघर्षों के दौर से तुलना करते हैं, तो ऐसा लगता है कि इतिहास और भी अधिक कपटी किरदारों के साथ वापस लौट रहा है. चरमपंथ की मशाल फिर से जल उठी है, चरमपंथ का धुआं फिर से उठ रहा है, और कट्टर दक्षिणपंथ (far-right) की वापसी हो रही है.
दिखावटी सुधार या राजनीतिक बहकावे को छोड़ दिया जाए, तो मूल बातें जस की तस हैं. जो पार्टियां खुद को फासीवाद या नाज़ीवाद से नहीं जोड़ना चाहतीं, वे सुविधाजनक रूप से खुद को सिर्फ दक्षिणपंथी (right-wing) के रूप में ब्रांड करती हैं; उदाहरण के लिए, स्पेन की राजनीतिक पार्टी Vox खुद को फासीवाद-विरोधी, नाज़ीवाद-विरोधी और दक्षिणपंथी बताती है.
यह विरोधाभास हर जगह फैला हुआ है, और उनका यह दोहरापन उनके काम आ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह दावा कि वह शांति बहाल करने के लिए युद्ध लड़ रहा है, उतना ही खोखला है जितना कि अफगानिस्तान में शांति बहाल करने का उनका दावा, जिसके बाद वे वहां एक अधिक मजबूत तालिबान छोड़ गए, या फिर गाजा के पुनर्निर्माण के दावे, जहां बच्चे और महिलाओं सहित आम नागरिक आज भी बंदूकों और बमों के साये में जी रहे हैं.

सद्दाम हुसैन की हत्या ने ईरान को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बना दिया, जिससे पूरा क्षेत्र ISIS जैसे समूहों के पनपने का ठिकाना बन गया.
20वीं सदी के विश्व युद्धों के दौरान लोगों के पास जो तर्क थे और जो तर्क लोग अब पेश करते हैं, वे वास्तव में न्यायसंगत हैं या नहीं, यह बहस का विषय है, लेकिन एकमात्र अंतर जो कोई देख सकता है वह यह है कि कुछ व्यवहारों को इस हद तक सामान्य मान लिया गया है कि अब असामान्य व्यवहार को असामान्य नहीं देखा जाता.
यूक्रेन को सैन्य मदद देने का विरोध करने वालों का मानना है कि वे उन लोगों के मुकाबले इतिहास के सही रास्ते पर हैं जो बिना सोचे-समझे यूक्रेन को सैन्य सहायता का समर्थन करते हैं.
युद्ध में उलझे देशों को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है, चाहे वह यूक्रेन-रूस युद्ध हो या पश्चिम एशिया का युद्ध; कुछ लोगों का मानना है कि तटस्थ रहना ठीक है, कुछ का कहना है कि चुप रहना भी अपराध में शामिल होने जैसा है, और कुछ लोग किसी एक का पक्ष लेते हैं, और इनमें से हर किसी के पास खुद को सही साबित करने के लिए अपनी एक कहानी है.
इन बातों को उस दौर से जोड़कर देखें जब हिटलर को उसके कृत्यों के लिए तिरस्कार की भावना से देखा जाता था, तब कम से कम एक आम सहमति थी. अब वे विभाजन रेखाएं धुंधली पड़ गई हैं, बल्कि कहें तो कमजोर हो गई हैं, और पूर्वी जर्मनी का चुनाव परिणाम इसका एक सटीक उदाहरण है.
दक्षिणपंथी पार्टी ‘ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी’ (AfD), अब सैक्सनी-एनहाल्ट (Saxony-Anhalt) में अपनी पहली जीत के बाद सत्ता में आने का लक्ष्य बना रही है, जहां उसने 2002 से राज्य पर शासन करने वाली मध्य-दक्षिणपंथी पार्टी को हरा दिया.
AfD एक ऐसी पार्टी है जिसे सरकारी खुफिया एजेंसी ने एक चरमपंथी गुट के रूप में वर्गीकृत किया था, जिसके कारण मुकदमा भी चला. हालांकि अदालत ने इस पार्टी को चरमपंथी संगठन घोषित करने पर रोक लगा दी थी, लेकिन सरकारी खुफिया एजेंसी ने पाया था कि यह पार्टी विशेष समुदायों के प्रति वैसी ही कड़ी नफरत रखती है, जैसी नफरत नाज़ियों ने यहूदियों के प्रति दिखाई थी.
जर्मनी समेत एक दर्जन से अधिक शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, जिसमें AfD पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जा रही है, क्योंकि सरकार बनाने के लिए बहुमत से तीन सीटें कम होने के कारण AfD सैक्सनी-एनहाल्ट में गठबंधन के लिए अन्य दलों के साथ बातचीत कर रही है. इसके जवाब में, AfD के समर्थकों ने भी विभिन्न शहरों में जवाबी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं.
अगर वे सफल होते हैं, तो वे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार किसी राज्य में सरकार बनाएंगे. यूरोप में नई व्यवस्था कुछ हद तक 20वीं सदी के समान ही रूप ले रही है; बस कुछ समूहों ने पाला बदल लिया है. राज्यविहीन यहूदी जो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे जब नाज़ी उनका शिकार कर रहे थे, अब जब उनके (यहूदी) पास एक देश है, तो वे गाज़ावासियों (Gazans) का शिकार कर रहे हैं.
नाज़ियों के हाथों बहुत अधिक जुल्म का सामना करने के बाद, उन्होंने खुद जुल्म करने वालों की भूमिका अपना ली. बदलती हुई यह स्थिति फ्रैंट्ज़ फैनन की किताब ‘द रेच्ड ऑफ द अर्थ’ (The Wretched of the Earth) की याद दिलाती है, जो इस बात को उजागर करती है कि कैसे सताए गए लोग खुद जुल्म करने की इच्छा रखने लगते हैं.
आज यहूदी-विरोधी भावनाएं ज़ायनवाद-विरोधी (anti-Zionism) सोच के साथ मिल गई हैं, क्योंकि दुनिया भर के कई यहूदियों को बड़े पैमाने पर गाजा में जो कुछ भी हो रहा है, उसके समर्थकों के रूप में देखा जाता है. इजराइली राष्ट्र को लेकर शत्रुता धीरे-धीरे विकसित हुई है; होलोकॉस्ट (यहूदी नरसंहार) की यादें पीछे छूटती जा रही हैं और धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं. आज, अधिकांश टकराव एक राष्ट्र-राज्य के रूप में इजराइल के कदमों पर केंद्रित है, जो कि उस युग के बिल्कुल विपरीत है जब यहूदी बेघर होकर अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे.
अब, इजराइल के पास अपना देश, सुरक्षा और मातृभूमि है, तब भी इतने बड़े पैमाने पर अभाव और हमलों का सामना करने के बाद जुल्म करने वाले की भूमिका में आने को संयुक्त राष्ट्र के कई सदस्य देश आलोचना की नजर से देखते हैं. इजराइल कोई अकेला मामला नहीं है; चरमपंथ एक स्वीकार्य वास्तविकता के तौर पर फैल रहा है.
चरमपंथी समूहों का खुलेआम समर्थन करना या कट्टर दक्षिणपंथी समूहों की वकालत करना अब कोई वर्जित बात नहीं रह गई है. लोग अब खुलकर कट्टरपंथी समूहों का समर्थन करते हैं. पारंपरिक विभाजन रेखाएं कम हो गई हैं, और उनके झुकाव को लेकर जो अस्पष्टता थी, वह भी काफी हद तक खत्म हो चुकी है. AfD जैसे दक्षिणपंथी समूह अपनी विचारधारा के दम पर फल-फूल रहे हैं, चाहे वह अप्रवासी-विरोधी हो, अल्पसंख्यक-विरोधी हो या यूक्रेन-विरोधी.
बहुत जल्द यही विचारधारा जर्मनी में सरकारी भाषा बन जाएगी. इसी तरह, फ्रांस की कट्टर-दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन भी तानाशाही बयानबाजी के दम पर आगे बढ़ रही हैं. दशकों की विफलताओं, भ्रष्टाचार और अधूरे वादों के बाद, उदारवादी अब कट्टर-दक्षिणपंथियों के सामने अपनी जमीन खो रहे हैं, क्योंकि लोगों के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है.
कट्टर दक्षिणपंथ ही एकमात्र विकल्प बन गया है, क्योंकि उन्हें ‘कम बुरा’ माना जाता है. हालात कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ चुके हैं, यहां तक कि कुछ कट्टर दक्षिणपंथी नेताओं को भी – जैसे इटली की जॉर्जिया मेलोनी, जिन्हें अधिक कट्टरपंथी दक्षिणपंथी नेताओं से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. ये नेता न केवल उन्हें राजनीतिक रूप से चुनौती दे रहे हैं, बल्कि उनके रूढ़िवादी होने की साख पर भी सवाल उठा रहे हैं.
कट्टर विचारों को अब बुरा नहीं माना जाता; बल्कि सार्वजनिक रूप से उनका बखान करना एक सामान्य बात बन गई है. दुनिया का हर हिस्सा इस खतरे का सामना कर रहा है, और भारतीय उपमहाद्वीप भी इससे अछूता नहीं है. उम्मीद है कि अगली पीढ़ी इन सब चीजों को फिर से तिरस्कार की भावना से देख सकती है और दुनिया को फिर से जीने लायक बना सकती है ताकि लोगों को इन सब से कुछ राहत मिल सके.
उम्मीद अगली पीढ़ी (Gen Next) से आती है, क्योंकि वे 1914 के ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज के उन 2 5 प्रतिशत छात्रों जैसे लोगों से प्रेरणा लेते हैं, जिन्होंने दुनिया में शांति लाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी.
Leave a comment