Thedigitalkhabari ब्यूरो: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के देशों की आवाज को मजबूती से उठाया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नीति-निर्माण में विकासशील देशों की उपेक्षा पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये देश संकटों का सामना करने में तो सबसे आगे रहते हैं, लेकिन वैश्विक नीतियों के निर्धारण में इन्हें हमेशा पीछे रखा जाता है।
संकटों का सामना और नीतिगत उपेक्षा
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि दुनिया के मौजूदा भू-राजनीतिक और आर्थिक संकटों का सबसे अधिक प्रभाव विकासशील देशों पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि जब भी खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट या जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां आती हैं, तो ग्लोबल साउथ के देश सबसे पहले प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद, वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी भागीदारी नगण्य है।
ग्लोबल साउथ के देश संकटों के मोर्चे पर सबसे आगे हैं, लेकिन नीति-निर्माण की कतार में वे सबसे पीछे खड़े किए जाते हैं। यह असंतुलन अब और अधिक नहीं चल सकता।
भारत की भूमिका और ग्लोबल साउथ का नेतृत्व
जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि भारत लगातार ग्लोबल साउथ की आवाज बनने का प्रयास कर रहा है। जी20 की अध्यक्षता के दौरान भी भारत ने विकासशील देशों के मुद्दों को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में लाने का काम किया था।
प्रमुख बिंदु:
- वैश्विक संस्थानों में सुधार की तत्काल आवश्यकता।
- विकासशील देशों की आर्थिक और सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता देना।
- बहुपक्षीय मंचों पर ग्लोबल साउथ की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ाना।
- आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में विविधता लाने के लिए वैश्विक सहयोग।
विदेश मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया दो ध्रुवीय गुटों में बंटती नजर आ रही है। जयशंकर का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को न्यायपूर्ण बनाना है, तो ग्लोबल साउथ को केवल एक ‘दर्शक’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘निर्णायक’ के रूप में शामिल करना होगा।
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