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लो-डोज़ सीटी स्कैन से कम हो सकती है फेफड़ों के कैंसर से मौत, IARC की रिपोर्ट में खुलासा

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लो-डोज़ सीटी स्कैन से कम हो सकती है फेफड़ों के कैंसर से मौत, IARC की रिपोर्ट में खुलासा
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Thedigitalkhabari एक्सप्लेनर: हाल ही में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) की तरफ से एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत भरी मेडिकल रिसर्च सामने आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार, यदि उच्च जोखिम वाले लोगों की लो-डोज़ कंप्यूटेड टोमोग्राफी यानी लो-डोज़ सीटी स्कैन (LDCT) के जरिए समय पर जांच की जाए, तो फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों के आंकड़ों में लगभग 16 फीसदी तक की भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है। यह वैज्ञानिक खोज दुनिया भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों और चिकित्सा जगत के लिए एक मील का पत्थर साबित हो रही है, क्योंकि फेफड़ों का कैंसर वैश्विक स्तर पर सबसे जानलेवा और घातक कैंसर प्रकारों में से एक माना जाता है। इस रिपोर्ट ने उन तमाम भ्रांतियों को भी दूर कर दिया है जो सीटी स्कैन से जुड़े रेडिएशन के डर को लेकर समाज में फैली हुई थीं। वर्तमान समय में भारत सहित पूरे विश्व में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है, जिसका एक बड़ा कारण बढ़ता प्रदूषण, जीवनशैली में बदलाव और सिगरेट-तंबाकू का सेवन है। ऐसे में यह नई तकनीक और इसके आंकड़े मरीजों के जीवन की रक्षा करने में अत्यंत कारगर साबित हो सकते हैं, बशर्ते इसे समय रहते राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में शामिल किया जाए और इसके प्रति जनता को जागरूक किया जाए।

5 प्रमुख बातें जो आपको जाननी चाहिए (5 Key Takeaways)

  • IARC के अनुसार लो-डोज़ सीटी स्कैन से फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों में 16% की कमी आ सकती है।
  • यह स्क्रीनिंग प्रक्रिया पारंपरिक सीटी स्कैन के मुकाबले काफी कम रेडिएशन का उपयोग करती है, जिससे यह सुरक्षित है।
  • धूम्रपान करने वाले या अतीत में धूम्रपान छोड़ चुके उच्च जोखिम वाले लोगों के लिए यह जांच सबसे ज्यादा फायदेमंद है।
  • कैंसर का शुरुआती अवस्था में पता चलने से इलाज की सफलता दर कई गुना बढ़ जाती है और मरीज की जान बच सकती है।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक को सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य योजनाओं में प्राथमिकता के आधार पर जोड़ा जाना चाहिए।

मामला क्या है? (Understanding the Core Issue)

फेफड़ों का कैंसर यानी लंग कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसके लक्षण आमतौर पर शुरुआती चरणों में दिखाई नहीं देते हैं। जब तक मरीज को इस गंभीर बीमारी का अहसास होता है, तब तक यह कैंसर शरीर के अन्य अंगों में फैल चुका होता है, जिसे मेडिकल भाषा में मेटास्टेसिस कहा जाता है। यही कारण है कि फेफड़ों के कैंसर में मृत्यु दर सबसे अधिक होती है। पारंपरिक एक्स-रे और अन्य सामान्य जांचें अक्सर शुरुआती ट्यूमर को पकड़ने में विफल रहती हैं। इसी समस्या के समाधान के रूप में लो-डोज़ सीटी स्कैन तकनीक को विकसित किया गया। IARC की इस व्यापक समीक्षा और अध्ययन ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही समय पर यानी लक्षण उभरने से पहले ही इस विशेष स्कैन का उपयोग किया जाए, तो माइक्रोस्कोपिक स्तर पर भी कैंसर कोशिकाओं की पहचान की जा सकती है। इस अध्ययन ने दुनियाभर के ऑन्कोलॉजिस्टों को एक नया हथियार दे दिया है, जिससे वे इस जानलेवा बीमारी के खिलाफ जंग में बढ़त हासिल कर सकते हैं। चिकित्सा वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि इस प्रकार की स्क्रीनिंग से न केवल मरीजों की जान बचेगी, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले महंगे और दर्दनाक कैंसर उपचारों के वित्तीय बोझ से भी परिवारों को राहत मिलेगी।

मुख्य कारण और वजहें (Root Causes)

फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते मामलों और इससे होने वाली मौतों के पीछे कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा और मुख्य कारण तंबाकू का सेवन, सिगरेट पीना और पैसिव स्मोकिंग है। हालांकि, यह समझना भी बेहद जरूरी है कि फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ दशकों में ऐसे मामलों में भारी उछाल आया है जो कभी सिगरेट या तंबाकू को हाथ तक नहीं लगाते थे। इसके लिए हमारे महानगरों का गंभीर वायु प्रदूषण, जहरीली हवा, कार्यस्थलों पर मौजूद खतरनाक केमिकल्स जैसे एस्बेस्टस और रेडॉन गैस का संपर्क मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। इसके अलावा, आनुवंशिक कारक और पारिवारिक इतिहास भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। जब ये सभी कारक मिलते हैं, तो फेफड़ों के ऊतकों में म्यूटेशन शुरू हो जाता है, जो धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले लेता है। चूंकि शुरुआती दौर में मरीज को सामान्य खांसी या सांस लेने में हल्की तकलीफ महसूस होती है, जिसे लोग अक्सर साधारण सर्दी-जुकाम मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, इसलिए बीमारी विकराल रूप ले लेती है। यही वजह है कि IARC जैसी प्रतिष्ठित संस्थाएं अब नियमित और लक्षित स्क्रीनिंग पर जोर दे रही हैं ताकि कारणों के गंभीर होने से पहले ही उसका निदान किया जा सके।

लो-डोज़ सीटी स्कैन तकनीक कैंसर के खिलाफ हमारी लड़ाई में एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। समय पर की गई जांच से अनगिनत बहुमूल्य जानें बचाई जा सकती हैं और हमें इस तकनीक को आम जनता तक सुलभ बनाना होगा।

निष्कर्ष और आगे का रास्ता (Conclusion & Outlook)

निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि IARC की यह रिपोर्ट स्वास्थ्य क्षेत्र में एक नई सुबह की तरह है। फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों में 16% की कमी लाने का यह दावा केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हजारों हंसते-खेलते परिवारों को उजड़ने से बचाने की एक ठोस उम्मीद है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती इस तकनीक को देश के दूर-दराज के इलाकों और हर आर्थिक वर्ग के लोगों तक सुलभ बनाने की है। सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों को मिलकर एक ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिसमें उच्च जोखिम वाले समूहों की मुफ्त या रियायती दरों पर लो-डोज़ सीटी स्कैन जांच हो सके। इसके साथ ही, तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रमों को सख्ती से लागू करने और पर्यावरण प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए दीर्घकालिक नीतियों पर काम करना होगा। जब तक हम रोकथाम और शुरुआती जांच के इस दोहरे फार्मूले को पूरी दृढ़ता से नहीं अपनाएंगे, तब तक इस बीमारी पर पूरी तरह से विजय पाना कठिन होगा। आने वाले समय में यह जरूरी है कि मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाए और लोगों को जागरूक किया जाए ताकि वे किसी भी शुरुआती लक्षण को नजरअंदाज न करें और समय पर अपना सीटी स्कैन कराकर सुरक्षित जीवन की ओर कदम बढ़ाएं।

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Shubhanshu Mishra - Founder and Editor in Chief of The Digital Khabari

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