Thedigitalkhabari ग्राउंड रिपोर्ट: एनसीईआरटी द्वारा हाल ही में जारी की गई कक्षा नौ की नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड-पार्ट 2’ ने शिक्षा जगत और वैचारिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह पुस्तक भारतीय इतिहास के उन पहलुओं पर प्रकाश डालती है जो लंबे समय से स्कूली पाठ्यक्रमों में हाशिए पर रहे थे। इस नई पुस्तक का मुख्य उद्देश्य छात्रों में न केवल विश्लेषणात्मक सोच को विकसित करना है, बल्कि उन्हें देश के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास के सांस्कृतिक तथा संघर्षपूर्ण पक्षों से भी अवगत कराना है। पुस्तक में विशेष रूप से सातवीं शताब्दी के बाद से भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों, भारतीय शासकों के प्रतिरोध और इस दौरान उपजी सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।
ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)
- कक्षा नौ के लिए एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड-पार्ट 2’ बाजार में आ चुकी है।
- पुस्तक में सातवीं शताब्दी के बाद से भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों का तथ्यात्मक और ऐतिहासिक ब्योरा दिया गया है।
- भारतीय राजाओं और योद्धाओं द्वारा अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए किए गए संघर्षों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है।
- युद्ध के संकट के समय देवी-देवताओं, विशेषकर मां काली और दुर्गा की पूजा और उनसे शक्ति प्राप्त करने की सांस्कृतिक परंपरा का उल्लेख है।
- इस पाठ्यक्रम का मुख्य उद्देश्य माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच और अंतर-सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देना है।
घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)
शिक्षा मंत्रालय और एनसीईआरटी की ओर से लंबे समय से स्कूली पाठ्यक्रम को भारतीय परिप्रेक्ष्य के अधिक अनुकूल बनाने के प्रयास किए जा रहे थे। इसी कड़ी में नौवीं कक्षा के लिए इस नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक को तैयार किया गया है। पुस्तक के अध्यायों की समीक्षा करने पर यह स्पष्ट होता है कि इसमें सातवीं शताब्दी के शुरुआती दौर से लेकर मध्यकाल तक के राजनीतिक और धार्मिक परिदृश्य को गहराई से खंगाला गया है। उस कालखंड में जब भारत पर विभिन्न दिशाओं से आक्रमण हो रहे थे, तब स्थानीय राजाओं और योद्धाओं ने किस प्रकार अपनी भौगोलिक सीमाओं और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए संघर्ष किया, इसका सिलसिलेवार वर्णन किया गया है। पाठ्यक्रम में यह भी जोड़ा गया है कि कैसे उस समय के राजाओं को युद्ध के मैदान में मनोबल बनाए रखने के लिए धार्मिक और आध्यात्मिक प्रेरणा मिलती थी। इसी संदर्भ में मां काली और दुर्गा जैसी देवियों से तलवारें प्राप्त करने की लोककथाओं और ऐतिहासिक मान्यताओं का जिक्र किया गया है, जो उस दौर के योद्धाओं की मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाती हैं।
प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)
इस नई पुस्तक के आने के बाद से ही शिक्षाविदों, इतिहासकारों और आम जनता के बीच विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां कई शिक्षाविदों का मानना है कि यह पाठ्यक्रम छात्रों को अपनी जड़ों और इतिहास के वास्तविक संघर्षों से जोड़ने का एक सराहनीय प्रयास है, वहीं कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इतिहास को इस प्रकार प्रस्तुत करने से तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर भी विचार होना चाहिए। एनसीईआरटी के अधिकारियों का कहना है कि यह पुस्तक पूरी तरह से शोध और अकादमिक परामर्श के आधार पर तैयार की गई है, जिसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि इतिहास के अनछुए पहलुओं को सामने लाना है।
यह पुस्तक हमारे छात्रों को भारतीय इतिहास के उन अध्यायों से परिचित कराती है जिन्हें पारंपरिक इतिहास लेखन में या तो नजरअंदाज कर दिया गया था या बहुत संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया था। इतिहास के इन पक्षों को जानना हर विद्यार्थी का अधिकार है ताकि वे अपनी संस्कृति और संघर्षों को बेहतर ढंग से समझ सकें। – शिक्षा विशेषज्ञ
आगे क्या? (What Lies Ahead)
आने वाले शैक्षणिक सत्र से इस नई पाठ्यपुस्तक को देश के विभिन्न विद्यालयों में पूरी तरह से लागू किए जाने की योजना है। इसके साथ ही शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं ताकि वे इस पाठ्यक्रम को छात्रों तक सही परिप्रेक्ष्य में पहुंचा सकें। शिक्षा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि इस तरह के बदलाव आने वाले समय में भारतीय शिक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम विकास की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि छात्र इस नई सामग्री को किस प्रकार ग्रहण करते हैं और यह उनके बौद्धिक विकास में कितना सहायक सिद्ध होती है।
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