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धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, राष्ट्रीय प्रगति के लिए चार स्तंभ जरूरी: मोहन भागवत

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धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, राष्ट्रीय प्रगति के लिए चार स्तंभ जरूरी: मोहन भागवत
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Thedigitalkhabari की विशेष रिपोर्ट: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में महाराष्ट्र में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के दौरान देश और समाज को एक नई दिशा देने वाले विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धर्म का दायरा केवल कुछ निश्चित अनुष्ठानों, पूजा-पद्धति या खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है जो समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाती है। भागवत ने अपने संबोधन में भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों के आधार पर देश की प्रगति के लिए चार प्रमुख स्तंभों को रेखांकित किया। उनके इस बयान ने देश भर के बौद्धिक और सामाजिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां लोग विकास के पारंपरिक मॉडलों से हटकर अधिक समावेशी और नैतिक दृष्टिकोण पर विचार कर रहे हैं।

घटना की गहराई और प्रमुख पहलू (Deep Breakdown)

  • मोहन भागवत ने धर्म को केवल व्यक्तिगत आस्था से ऊपर उठाकर सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिकता का विषय बताया।
  • उन्होंने समाज के सबसे कमजोर और हाशिए पर मौजूद वर्गों के उत्थान पर विशेष जोर दिया।
  • ‘अंत्योदय’ की अवधारणा को बढ़ावा देते हुए उन्होंने पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाने की बात कही।
  • आरएसएस प्रमुख ने केवल भौतिक विकास और संकीर्ण आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों को खारिज करते हुए समग्र विकास का समर्थन किया।
  • पर्यावरण संरक्षण और सभी जीवित प्राणियों के कल्याण को राष्ट्र निर्माण का अनिवार्य हिस्सा माना गया।

पृष्ठभूमि और बड़ा परिदृश्य (Background & Context)

भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्म शब्द की व्याख्या हमेशा से व्यापक रही है। आधुनिक युग में जहां वैश्वीकरण और अंधाधुंध औद्योगीकरण ने मानवीय मूल्यों और पर्यावरण को संकट में डाल दिया है, वहां इस प्रकार के वैचारिक मंथन की प्रासंगिकता बहुत बढ़ जाती है। मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश आर्थिक महाशक्ति बनने की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक असमानता, सांस्कृतिक विस्मृति और पर्यावरण संतुलन जैसे गंभीर मुद्दे भी सामने आ रहे हैं। संघ प्रमुख ने सदियों पुराने भारतीय दर्शन का हवाला देते हुए याद दिलाया कि वास्तविक प्रगति वही है जिसमें समाज का हर एक वर्ग सुरक्षित महसूस करे और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जिया जाए। अंत्योदय का यह विचार पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद से गहराई से जुड़ा हुआ है, जो व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ब्रह्मांड के बीच संतुलन स्थापित करने की वकालत करता है।

प्रभाव और दूरगामी परिणाम (Impact Analysis)

इस वैचारिक दृष्टिकोण के देश की नीतियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की सोच पर दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। जब नीति निर्माता और समाज सुधारक आर्थिक विकास के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देंगे, तो कल्याणकारी योजनाओं का दायरा और अधिक प्रभावी हो जाएगा। यह दृष्टिकोण उन तर्कों को भी बल देता है जो जीडीपी (GDP) के आंकड़ों से परे जाकर ‘सकल राष्ट्रीय खुशी’ (Gross National Happiness) और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की बात करते हैं। समाज के वंचित तबके को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जमीनी स्तर पर प्रयास तेज होंगे, जिससे सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा, पर्यावरण संरक्षण के प्रति बढ़ती जागरूकता जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में भी मददगार साबित होगी।

सच्चा विकास वही है जो केवल कंक्रीट के जंगलों का निर्माण न करे, बल्कि मानवीय करुणा, सामाजिक न्याय और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी के सिद्धांतों पर आधारित हो।

अंतिम निष्कर्ष (Final Takeaway)

मोहन भागवत द्वारा रेखांकित किए गए ये चार स्तंभ न केवल वैचारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, बल्कि एक विकसित और समृद्ध भारत के निर्माण के लिए रोडमैप भी मुहैया कराते हैं। जब तक समाज का हर अंग मजबूत नहीं होता और प्रकृति का संतुलन सुरक्षित नहीं रहता, तब तक किसी भी राष्ट्र की प्रगति को पूर्ण नहीं माना जा सकता। यह समय की मांग है कि हम अपने प्राचीन मूल्यों और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच एक बेहतर समन्वय स्थापित करें, ताकि देश का भविष्य सुरक्षित, समावेशी और स्थायी हो सके।

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Shubhanshu Mishra - Founder and Editor in Chief of The Digital Khabari

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