Home जांजगीर-चांपा “रामबांधा तालाब की आखिरी पुकार ! कभी चांपा की पहचान था यह जलाशय, आज जलकुंभी के कब्जे में दम तोड़ रहा अस्तित्व”
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“रामबांधा तालाब की आखिरी पुकार ! कभी चांपा की पहचान था यह जलाशय, आज जलकुंभी के कब्जे में दम तोड़ रहा अस्तित्व”

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जांजगीर-चांपा। कभी स्वच्छ जल और अपने विस्तृत स्वरूप से लोगों को आकर्षित करने वाला चांपा का ऐतिहासिक रामबांधा तालाब आज अपनी बदहाली पर मानो आंसू बहा रहा है। जिस तालाब से शहर की पहचान और स्थानीय लोगों की भावनाएं जुड़ी रही हैं, उसका बड़ा हिस्सा आज जलकुंभी और अन्य जलीय वनस्पतियों से घिरा दिखाई देता है। यह स्थिति केवल एक तालाब की दुर्दशा नहीं, बल्कि स्थानीय जलस्रोतों के संरक्षण, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

कभी खूबसूरती और स्वच्छ जल के लिए जाना जाता था रामबांधा तालाब

रामबांधा तालाब केवल पानी का एक स्रोत नहीं, बल्कि चांपा की स्थानीय पहचान और स्मृतियों का हिस्सा रहा है। कभी इसका विस्तृत जलक्षेत्र और साफ पानी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता था। ऐसे जलाशय शहर के पर्यावरणीय संतुलन, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जैव विविधता के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं।लेकिन आज इसकी स्थिति देखकर सवाल उठता है कि जिस प्राकृतिक धरोहर को अगली पीढ़ियों के लिए सहेजकर रखना चाहिए था, उसकी हालत इस मुकाम तक कैसे पहुंच गई?क्या किसी शहर की पहचान से जुड़े जलाशय का संरक्षण केवल कागजों और योजनाओं तक सीमित रह जाना चाहिए?

जलकुंभी का बढ़ता फैलाव, जलीय जीवन पर संकट की आशंका

तालाब में जलकुंभी और अन्य जलीय पौधों का व्यापक फैलाव चिंता का विषय है। जब ऐसे पौधे किसी जलाशय की सतह पर अत्यधिक फैल जाते हैं, तो पानी में प्रकाश का प्रवेश और प्राकृतिक गैसों का आदान-प्रदान प्रभावित हो सकता है। इनके सड़ने से पानी में घुलित ऑक्सीजन भी कम हो सकती है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों के जीवन पर संकट पैदा होने की आशंका रहती है।रामबांधा तालाब की वास्तविक पारिस्थितिक स्थिति जानने के लिए जल की गुणवत्ता, घुलित ऑक्सीजन और अन्य जरूरी मानकों की वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।सवाल यह है कि क्या संबंधित विभाग ने तालाब के पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच कराई है? यदि कराई है, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? और यदि ऐसी जांच नहीं हुई है, तो इस महत्वपूर्ण जलाशय की सेहत जानने के लिए अब तक ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?

नगरपालिका और जल संसाधन विभाग की जवाबदेही तय कौन करेगा?

रामबांधा तालाब की मौजूदा स्थिति स्थानीय निकाय और संबंधित विभागों की भूमिका पर सवाल उठाती है। हालांकि, जिम्मेदारी तय करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि तालाब का स्वामित्व, रखरखाव और संरक्षण किस विभाग या संस्था के अधीन है तथा अब तक इसके लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं।फिर भी, नागरिकों के मन में उठ रहे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।- क्या तालाब की सफाई और जलकुंभी हटाने के लिए कोई नियमित कार्ययोजना है?- पिछले कुछ वर्षों में इसके संरक्षण और सौंदर्यीकरण पर कितनी राशि स्वीकृत हुई और वास्तव में कितना काम हुआ?- यदि बजट आवंटित हुआ, तो उसके खर्च और कार्यों की प्रगति का विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?- क्या तालाब में गंदे पानी या नालों का प्रवाह हो रहा है? यदि हां, तो उसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए?- क्या तालाब की गहराई, जलभराव क्षेत्र और प्राकृतिक जलप्रवाह को सुरक्षित रखने के लिए कोई वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया गया है?- जलकुंभी की बार-बार वृद्धि रोकने के लिए स्थायी समाधान क्या है?इन सवालों के जवाब केवल अधिकारियों के आश्वासन से नहीं, बल्कि सार्वजनिक रिकॉर्ड, निरीक्षण रिपोर्ट और जमीन पर दिखाई देने वाले काम से मिलने चाहिए।

सिर्फ सफाई नहीं, तालाब के पुनर्जीवन की जरूरत

जलकुंभी हटाना जरूरी हो सकता है, लेकिन इसे ही तालाब के संरक्षण का संपूर्ण समाधान नहीं माना जा सकता। यदि जलकुंभी के फैलाव के पीछे पोषक तत्वों से युक्त गंदे पानी का प्रवेश, ठहरा हुआ पानी या अन्य पर्यावरणीय कारण हैं, तो उनकी पहचान और रोकथाम भी आवश्यक होगी।रामबांधा तालाब के पुनर्जीवन के लिए विशेषज्ञों की मदद से विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। इसमें जल की गुणवत्ता की जांच, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान, जलकुंभी का वैज्ञानिक प्रबंधन, प्राकृतिक जलप्रवाह का संरक्षण और नियमित निगरानी शामिल होनी चाहिए।साथ ही, संरक्षण कार्यों की समयसीमा, बजट और जिम्मेदार अधिकारियों का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि नागरिक यह जान सकें कि तालाब को बचाने की दिशा में वास्तव में क्या प्रगति हो रही है।

सवाल सिर्फ तालाब का नहीं, चांपा की विरासत का है

रामबांधा तालाब की बदहाली शहर के हर उस नागरिक के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए, जो अपने आसपास के पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की परवाह करता है।आज आवश्यकता केवल जलकुंभी हटाने की नहीं, बल्कि उस सोच को बदलने की है जिसमें जलस्रोतों को उनकी उपयोगिता समाप्त होने तक उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। किसी तालाब का महत्व तभी समझा जाना चाहिए, जब वह संकट में न हो।

प्रशासन से सीधा सवाल है—क्या रामबांधा तालाब को उसके पुराने स्वरूप के करीब लाने के लिए कोई समयबद्ध और सार्वजनिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी, या चांपा की यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती रहेगी?रामबांधा तालाब को बचाना केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। लेकिन पहल, संसाधन, वैज्ञानिक योजना और जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रमुख जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरणों की ही है।इस तालाब को आज सहानुभूति से अधिक ठोस कार्रवाई की जरूरत है। क्योंकि यदि समय रहते इसके संरक्षण के लिए कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास शायद रामबांधा तालाब की पहचान केवल पुरानी तस्वीरों और बुजुर्गों की यादों में ही शेष रह जाए।

अब वक्त सवाल पूछने का भी है और जवाब मांगने का भी। रामबांधा तालाब को बचाने के लिए कार्रवाई कब शुरू होगी?

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Shubhanshu Mishra - Founder and Editor in Chief of The Digital Khabari

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