Thedigitalkhabari ग्राउंड रिपोर्ट: अरावली पर्वत श्रृंखला के मंगेर क्षेत्र में एक बड़ा प्रशासनिक और पर्यावरणीय विरोधाभास सामने आया है, जो इस प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। यहां सैकड़ों की संख्या में पहाड़ियां मौजूद होने के बावजूद राजस्व रिकॉर्ड में इस संवेदनशील क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को ‘कृषि योग्य भूमि’ के रूप में दर्ज किया गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए जाने के पूरे एक दशक बाद भी कागजी दस्तावेजों में सुधार न होने के कारण भू-माफिया और अनियोजित विकास का रास्ता साफ हो गया है। हाल ही में किए गए एक विस्तृत जमीनी सर्वेक्षण से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिन जमीनों को कागजों में खेती योग्य बताया जा रहा है, असल में वहां दुर्गम पहाड़ियां और पथरीली जमीनें हैं, जिन पर कृषि किया जाना असंभव है। इस तकनीकी खामी का फायदा उठाकर पर्यावरण कानूनों को धता बताते हुए बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य और व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं, जिससे स्थानीय जैव विविधता और भूजल स्तर दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है।
ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)
- मंगेर क्षेत्र में सैकड़ों पहाड़ियां होने के बावजूद राजस्व रिकॉर्ड में इसे कृषि भूमि के रूप में दिखाया गया है।
- एनजीटी (NGT) के स्पष्ट आदेशों के बावजूद पिछले दस वर्षों में कागजी विसंगतियों को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
- हालिया ग्राउंड सर्वे से यह साबित हुआ है कि रिकॉर्ड में दर्ज कृषि भूमि असल में अरावली की घनी पहाड़ियां और गैर-कृषि योग्य क्षेत्र हैं।
- भूमि वर्गीकरण की इस गंभीर विसंगति से अरावली के जंगलों, वन्यजीवों और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
- स्थानीय पर्यावरणविदों और संरक्षणवादियों ने इस चूक को सुधारने और तत्काल प्रभाव से अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग की है।
घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)
इस पूरे मामले की जड़ें काफी गहरी हैं। करीब एक दशक पहले, पर्यावरणविदों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने मंगेर के जंगलों और पहाड़ियों में हो रहे अंधाधुंध अतिक्रमण और निर्माण कार्यों के खिलाफ आवाज उठाई थी। उस समय राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए संबंधित विभागों को निर्देश दिया था कि वे क्षेत्र के वास्तविक भू-उपयोग (Land Use) की समीक्षा करें और राजस्व रिकॉर्ड को दुरुस्त करें। उद्देश्य यह था कि अरावली के इस महत्वपूर्ण हिस्से को किसी भी प्रकार के व्यावसायिक निर्माण और भू-परिवर्तन से बचाया जा सके। हालांकि, संबंधित विभागों और स्थानीय प्रशासन की उदासीनता के कारण यह प्रक्रिया कागजों में ही उलझ कर रह गई। हाल ही में जब विशेषज्ञों और स्वतंत्र शोधकर्ताओं की एक टीम ने मंगेर का जमीनी दौरा किया, तो उन्होंने पाया कि कागजी दस्तावेजों और वास्तविक धरातल के बीच जमीन-आसमान का फर्क है। जिन क्षेत्रों को राजस्व नक्शों में कृषि भूमि दर्शाया गया था, वे वास्तव में दुर्गम पहाड़ियां, प्राकृतिक जल स्रोतों के बहाव क्षेत्र और घनी झाड़ियों से ढंके पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील जोन हैं। इन निष्कर्षों के सामने आने के बाद से क्षेत्र में एक बार फिर से हलचल मच गई है और पर्यावरण प्रेमियों में प्रशासन के प्रति गहरा रोष व्याप्त है।
प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)
राजस्व रिकॉर्ड की इस भारी खामी के उजागर होने के बाद स्थानीय स्तर पर प्रशासन पर दबाव बढ़ना शुरू हो गया है। हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी तक किसी बड़े सुधार की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन जिला प्रशासन के सूत्रों का कहना है कि वे इस मामले में विधिक सलाह ले रहे हैं। दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों और पर्यावरण संगठनों का कहना है कि कागजों की यह गड़बड़ी कोई साधारण मानवीय भूल नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा गठजोड़ है जो अरावली की जमीनों को औने-पौने दामों में बेचकर व्यावसायिक लाभ कमाना चाहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस वर्गीकरण की विसंगति को जल्द ही नहीं सुधारा गया, तो आने वाले समय में मंगेर की हरी-भरी पहाड़ियां कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो जाएंगी।
हम पिछले कई सालों से प्रशासन को यह याद दिला रहे हैं कि मंगेर में कृषि भूमि का रिकॉर्ड पूरी तरह से फर्जी और भ्रामक है। यहां खेती होती ही नहीं है, यह अरावली का मूल पहाड़ी क्षेत्र है। अगर इस रिकॉर्ड को तुरंत नहीं बदला गया, तो अरावली की यह आखिरी बची हुई सांसें भी थम जाएंगी। – स्थानीय पर्यावरणविद व सामाजिक कार्यकर्ता
आगे क्या? (What Lies Ahead)
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सबकी निगाहें एक बार फिर से न्यायपालिका और उच्चाधिकारियों पर टिकी हैं। पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस दिशा में कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो वे एक बार फिर कानूनी रास्ता अपनाते हुए एनजीटी का दरवाजा खटखटाएंगे। आवश्यकता इस बात की है कि एक स्वतंत्र उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया जाए जो पूरे मंगेर क्षेत्र का सैटेलाइट मैपिंग और भौतिक सत्यापन करे, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके। इसके अलावा, गलत प्रविष्टियां करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करना भी बेहद जरूरी है, तभी अरावली के इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर को बचाया जा सकेगा और भविष्य के पर्यावरणीय संकटों से निपटा जा सकेगा।
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