बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि कोई निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानूनन स्थापित अदालत का दर्जा नहीं रखता। ऐसी संस्थाएं किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति तय करने या विवाह विच्छेद की कानूनी घोषणा करने का अधिकार नहीं रखतीं।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने रायपुर स्थित इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के 18 जनवरी 2022 के उस आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित किया, जिसमें याचिकाकर्ता महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे निजी संस्थान का आदेश किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या दायित्व में बदलाव नहीं कर सकता।

क्या है पूरा मामला?

रायपुर के टिकरापारा निवासी निरोश अब्बासी ने 18 जुलाई 2020 को मोहम्मद आबिद खान से विवाह किया था। विवाह के बाद पारिवारिक विवाद शुरू हुआ। पति का दावा था कि उन्होंने 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को तलाक-ए-हसन के तीन चरणों की घोषणा की थी।

महिला ने पति और ससुराल पक्ष पर उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप लगाते हुए शिकायत की थी। इसके बाद नवंबर 2021 में महिला थाना रायपुर में IPC की धारा 498-A और 34 के तहत FIR दर्ज हुई।

धार्मिक राय और कानूनी फैसला अलग

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली निजी धार्मिक संस्थाओं को कानून से स्थापित अदालत का दर्जा प्राप्त नहीं है। वे धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन उनकी राय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होती।

कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया के आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया और स्पष्ट किया कि FIR तथा अन्य कानूनी उपायों पर उसके आदेश का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।