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नागपंचमी पर जांजगीर में दिखी अनोखी परंपरा

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जांजगीर-चांपा जिले में नागपंचमी के अवसर पर एक खास और वर्षों पुरानी परंपरा देखने को मिली। जिला मुख्यालय की पुरानी बस्ती में शाम होते ही ढोल, झांझ, मंजीरा और मांदर की थाप ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। देखते ही देखते महिला, पुरुष और बच्चों की भीड़ जमा हो गई और इसी भीड़ के बीच शुरू हुआ लोगों के सांप बनने का सिलसिला। इस अनोखी परंपरा को स्थानीय लोग नंगमत के नाम से जानते हैं। आखिर क्या है नंगमत और क्यों निभाई जाती है ये परंपरा, देखिए ये खास रिपोर्ट।

जांजगीर-चांपा जिले में नागपंचमी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। सावन महीने के सोमवार को नागपंचमी पड़ने के कारण जिले के विभिन्न शिवालयों में भी विशेष पूजा-अर्चना और नाग पूजा की गई।


वहीं जांजगीर की पुरानी बस्ती में नागपंचमी के अवसर पर नंगमत का आयोजन किया गया। इस दौरान युवा और बुजुर्ग अखाड़े में उतरकर सांप की तरह हरकतें करते नजर आए।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, बैगा मंत्रोच्चार के जरिए सांप का रूप धारण करने वाले व्यक्ति को नियंत्रित करते हैं और कुछ समय बाद मंत्रों के माध्यम से उसे सामान्य अवस्था में लाने की प्रक्रिया की जाती है।
हालांकि, यह एक स्थानीय धार्मिक और पारंपरिक मान्यता है और इस तरह की गतिविधियों को किसी वैज्ञानिक उपचार या प्रमाणित चिकित्सा पद्धति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह आयोजन स्थानीय परंपरा और आस्था से जुड़ा हुआ है।


बताया जाता है कि जांजगीर की पुरानी बस्ती में वर्षों से कहरा समाज सहित विभिन्न समाजों के लोग अपने गुरुओं से बैगाई की दीक्षा लेते आए हैं। नागपंचमी के अवसर पर नंगमत का आयोजन कर इन पारंपरिक मंत्रों का सामूहिक रूप से स्मरण किया जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, आयोजन के दौरान बैगाओं का समूह मंत्रोच्चार करता है और कुछ लोग मंत्र सुनने के बाद अपनी सामान्य अवस्था खोकर सांप जैसी गतिविधियां करने लगते हैं। इसके बाद पारंपरिक तरीके से मंत्रोच्चार कर उन्हें सामान्य अवस्था में लाने की प्रक्रिया की जाती है।


स्थानीय मान्यता और परंपरा के मुताबिक, नागपंचमी के दिन बैगा अपने गुरु से प्राप्त मंत्रों का स्मरण और परीक्षण करते हैं। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया को लेकर किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा न देने की अपील भी जरूरी है।

पार्षद गुड्डू कहरा के मुताबिक, पुराने समय में सर्पदंश की घटनाओं के बाद लोग बैगा के पास उपचार के लिए जाते थे और उन पर काफी विश्वास करते थे। लेकिन अब चिकित्सा विज्ञान के विकास के साथ सर्पदंश का उपचार अस्पतालों में उपलब्ध है।
उनका कहना है कि वर्तमान समय में बैगा भी सर्पदंश के मामले में झाड़-फूंक के बजाय चिकित्सा उपचार को प्राथमिकता देने की बात कहते हैं। नंगमत का आयोजन मुख्य रूप से अपने गुरु से प्राप्त पारंपरिक मंत्रों को याद करने और परंपरा को बनाए रखने के लिए किया जाता है।

नागपंचमी पर जांजगीर की पुरानी बस्ती में दिखी यह परंपरा लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रही। ढोल-मांदर की थाप और नंगमत की इस परंपरा को देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। हालांकि सर्पदंश जैसी स्थिति में झाड़-फूंक के बजाय तत्काल अस्पताल पहुंचना ही सुरक्षित और जरूरी कदम है।

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Shubhanshu Mishra - Founder and Editor in Chief of The Digital Khabari

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