Home छत्तीसगढ़ प्रगतिशील पशुपालक श्री जीवनलाल साहू ने वैज्ञानिक पशुपालन से गढ़ी आत्मनिर्भरता की मिसाल
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प्रगतिशील पशुपालक श्री जीवनलाल साहू ने वैज्ञानिक पशुपालन से गढ़ी आत्मनिर्भरता की मिसाल

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धमतरी जिले के कुरूद विकासखंड के ग्राम मुरा निवासी श्री जीवनलाल साहू की सफलता की कहानी मेहनत, नवाचार और पशुपालन में वैज्ञानिक तकनीकों के प्रभावी उपयोग का प्रेरणादायक उदाहरण है। सीमित संसाधनों से शुरू किया गया उनका डेयरी व्यवसाय आज न केवल उनके परिवार की आर्थिक मजबूती का आधार बना है, बल्कि क्षेत्र के अन्य पशुपालकों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।
  श्री जीवनलाल साहू ने मात्र दो गाय और दो भैंस से डेयरी व्यवसाय की शुरुआत की। प्रारंभिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने पशुपालन को पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ाने के बजाय आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया। निरंतर परिश्रम, बेहतर प्रबंधन और पशुओं की नस्ल सुधार पर विशेष ध्यान देते हुए उन्होंने अपने व्यवसाय का क्रमिक विस्तार किया।
 समय के साथ उन्होंने उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता वाली साहिवाल, गिर एवं मुर्रा नस्ल के पशुओं का पालन शुरू किया। इसके साथ ही देशी पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक का उपयोग कर उन्नत नस्ल के पशु तैयार किए। वर्तमान में उनके डेयरी फार्म में 10 दुधारू एचएफ एवं जर्सी नस्ल की गायें हैं। कृत्रिम गर्भाधान से उत्पन्न उन्नत नस्ल के बछड़ों एवं बछियों को तैयार कर विक्रय करने से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 1.50 से 2 लाख रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।
   आज श्री साहू के डेयरी फार्म से प्रतिदिन लगभग 70 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। उत्पादित दूध का विक्रय देवभोग सहकारी दुग्ध संघ तथा निजी होटलों में किया जाता है, जिससे उन्हें प्रतिमाह लगभग 1 से 1.50 लाख रुपये की आय प्राप्त होती है। पशुपालन एवं इससे जुड़ी गतिविधियों से उनकी कुल वार्षिक आय लगभग 3 से 3.50 लाख रुपये तक पहुंच गई है।

डेयरी व्यवसाय से अर्जित आय ने उनके परिवार के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाया है। उन्होंने अपने दोनों बच्चों को निजी विद्यालय में शिक्षा दिलाई और परिवार के लिए पक्का मकान बनवाया। कृषि कार्यों तथा दूध परिवहन की सुविधा के लिए मोटरसाइकिल भी खरीदी। इस प्रकार पशुपालन उनके लिए केवल आय का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति का मजबूत आधार बना है।

श्री जीवनलाल साहू की सफलता यह संदेश देती है कि वैज्ञानिक पशुपालन, उन्नत नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान, बेहतर पशु प्रबंधन और निरंतर मेहनत के माध्यम से सीमित संसाधनों वाला पशुपालक भी आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा सकता है। उनकी उपलब्धि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन की बढ़ती संभावनाओं को रेखांकित करती है और अन्य पशुपालकों को भी आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है।

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Shubhanshu Mishra - Founder and Editor in Chief of The Digital Khabari

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