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शिक्षा, रोजगार और किसानों के मुद्दों को लेकर दिल्ली में सीपीआई का मोर्चा, नीट को लेकर सरकार पर बरसे डी राजा

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नीट से जुड़ी आत्महत्याओं से लेकर एमएसपी की गारंटी तक, सीपीआई की रैली में उठे कई मुद्दे. गौतम देबरॉय की रिपोर्ट.

बिहार के औरंगाबाद निवासी 80 वर्षीय रामजोत सिंह के लिए दिल्ली की यात्रा महज एक राजनीतिक रैली में शामिल होने के लिए नहीं थी. यह उनके द्वारा शिक्षा प्रणाली में मौजूद खामियों के खिलाफ आवाज उठाने का भी एक तरीका था—उनका कहना है कि यह प्रणाली गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के छात्रों को निराशा की ओर धकेल रही है.

उन्होंने कहा, “मैं भारत की शिक्षा प्रणाली में बदलाव चाहता हूं ताकि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के छात्रों को आत्महत्या न करनी पड़े. हमें भ्रष्टाचार और पक्षपात से मुक्त शिक्षा प्रणाली चाहिए.” रामजोत ने मंगलवार को रामलीला मैदान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) द्वारा आयोजित “बदलाव जरूरी है” रैली में भाग लेते हुए ईटीवी भारत से अपनी बातें साझा की.

किसान रामजोत ने मुजफ्फरपुर के 18 वर्षीय श्रेयम की हाल ही में हुई मौत को याद किया,. वह नीट परीक्षा की तैयारी कर रहा था. उनके अनुसार उसने किसी जहरीले पदार्थ का सेवन किया. छात्रावास के कमरे में वह मृत पाया गया था. पुलिस को बाद में एक सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने कथित तौर पर अपने सपनों को पूरा न कर पाने की निराशा व्यक्त की थी.

रामजोत के लिए, यह घटना उन छात्रों पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है जो उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, विशेषकर उन परिवारों से आने वाले छात्र जो महंगे निजी कोचिंग या लंबे समय तक चलने वाले शैक्षणिक सहयोग का खर्च वहन नहीं कर सकते.लेकिन शिक्षा उन मुद्दों में से एक मात्र नहीं थी जिसके कारण देश के विभिन्न हिस्सों से प्रतिभागी राष्ट्रीय राजधानी में एकत्रित हुए थे.औरंगाबाद से रामेकबल सिंह और पंजाब के जालंधर से सुखबिंदर सिंह और दर्शन उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने इस कार्यक्रम में भाग लिया, जिसमें किसान समूह, महिला संगठन और दलित एवं आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधि एक साथ आए थे.

सुखबिंदर के लिए मुख्य चिंता कृषि और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की मांग थी.उन्होंने कहा, “हम एमएसपी की कानूनी गारंटी चाहते हैं. केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं जब किसानों के पास लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने वाला कोई लागू करने योग्य तंत्र न हो. कानूनी गारंटी कृषि नियोजन के लिए आवश्यक निश्चितता प्रदान कर सकती है और किसानों को मजबूरी में अपनी फसल बेचने से बचा सकती है.”

हजारों प्रतिभागियों ने रैली में भाग लिया और बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, एमएसपी, श्रमिकों के अधिकारों, चुनावी सुधारों और सामाजिक न्याय से संबंधित मांगें उठाईं. यह रैली इन मुद्दों पर जनमत जुटाने के लिए 6 से 15 अगस्त तक आयोजित राष्ट्रव्यापी पदयात्राओं की परिणति थी.

सीपीआई के राष्ट्रीय महासचिव डी राजा ने केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार पर तीखा हमला करते हुए उस पर कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों के पक्ष में नीतियां अपनाने का आरोप लगाया. उन्होंने ईटीवी भारत के साथ बातचीत करते हुए कहा, “केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार एक फासीवादी शासन चला रही है. देशभर में गरीब लोगों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है. सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निगमीकरण कर रही है. शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है.”

राजा ने आरोप लगाया कि सरकारी नीतियां तेजी से कुछ चुनिंदा “पूंजीपतियों” को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई जा रही हैं, जबकि आम नागरिकों को बढ़ते आर्थिक और सामाजिक दबावों का सामना करना पड़ रहा है.

उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में “चिंताजनक गिरावट” देखी जा रही है. उन्होंने जिन चिंताओं को उजागर किया उनमें बढ़ती कीमतें, बेरोजगारी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, कमजोर होती सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा, बार-बार परीक्षा प्रश्नपत्रों का लीक होना और महिला आरक्षण कानून का लगातार लागू न होना शामिल हैं.

राजा ने श्रमिकों के अधिकारों, चुनावी धांधली के आरोपों और दलितों एवं आदिवासियों पर बढ़ते अत्याचारों और विस्थापन पर भी चिंता जताई.सीपीआई नेता ने बताया कि पार्टी की दो दिवसीय केंद्रीय समिति की बैठक बुधवार से नई दिल्ली में शुरू होगी, जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी.हालांकि, रामजोत जैसे प्रतिभागियों के लिए, राजनीतिक बयानबाजी अंततः रोजमर्रा के संघर्षों से जुड़ी है—एक छात्र की परीक्षा को लेकर चिंता से लेकर एक किसान की अपनी फसल के दाम को लेकर अनिश्चितता तक.

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Shubhanshu Mishra - Founder and Editor in Chief of The Digital Khabari

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